lesson-2

Thursday, March 23, 2006

रूहानी पाठ-2

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जो हमे प्राप्‍त है,वो कम नही है। सबका स्नेह और समय-समय पर भगवद्कृपा की अनुभूति भी होती रहती है। अगर फिर भी हम प्रभु से शिकायत करते है, तो यह ठीक नहीं। हमारे को नहीं मालूम कि कल क्या होना है। परन्तु जो हो रहा है अच्छा ही हो रहा है, ऐसा हमे सोचते रहना है। जो हमारी नियती है वो अवश्य हमे मिल कर रहेगी। हमने सदैव प्रभु का कृतज्ञता ज्ञापित करनी है । भक्ति का अर्थ ही कृतज्ञता का भाव है। चाहे वह प्रार्थना के माध्यम से हो, अथवा प्रभु-चरणों की सेवा से ही हो।


गो धन,गज धन, बाज धन, और सकल धन खान।
जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूरी समान ।।


राजी है हम उसी मे जिसमे तेरी रजा है।
यहाँ यू भी वाह-वाह है, और वूँ भी वाह-वाह है।।

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